भारत में जन्मी महिला जो बनीं जॉर्डन की क्राउन प्रिंसेस, पीएम मोदी की यात्रा के बीच फिर चर्चा में ऐतिहासिक कहानी
कोलकाता में जन्मी सरवत इकरामुल्लाह ने 31 साल तक निभाई जॉर्डन की क्राउन प्रिंसेस की भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सप्ताह जॉर्डन यात्रा के बाद भारत और जॉर्डन के ऐतिहासिक रिश्तों पर एक बार फिर लोगों का ध्यान गया है। सोमवार, 15 दिसंबर 2025 को पीएम मोदी ने जॉर्डन की राजधानी अम्मान स्थित अल-हुसैनिया पैलेस में जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय बिन अल हुसैन के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की अहम बैठक की। इसी कूटनीतिक पृष्ठभूमि में एक ऐसी भारतीय मूल की महिला की कहानी फिर सामने आई है, जिनका जीवन भारत, पाकिस्तान और जॉर्डन—तीनों देशों से गहराई से जुड़ा रहा।
यह कहानी है प्रिंसेस सरवत एल. हसन की, जिनका जन्म 1947 में कोलकाता में हुआ था, यानी भारत-पाकिस्तान विभाजन से कुछ ही सप्ताह पहले। वे प्रतिष्ठित बंगाली मुस्लिम सुहरावर्दी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनका जन्म नाम सरवत इकरामुल्लाह था। उनके पिता मोहम्मद इकरामुल्लाह भारतीय सिविल सेवा (ICS) के अधिकारी रहे और बाद में पाकिस्तान के पहले विदेश सचिव बने। उनकी मां शाइस्ता सुहरावर्दी इकरामुल्लाह पाकिस्तान की पहली महिला सांसदों में शामिल थीं और मोरक्को में पाकिस्तान की राजदूत भी रहीं।
सरवत की पढ़ाई ब्रिटेन में हुई। पिता की अलग-अलग देशों में राजनयिक तैनातियों के कारण उनका बचपन और युवावस्था एक अंतरराष्ट्रीय माहौल में बीती। इसी दौरान लंदन में आयोजित एक राजनयिक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात जॉर्डन के हाशमी वंश के प्रिंस हसन बिन तलाल से हुई, जो आगे चलकर उनके जीवन का अहम मोड़ साबित हुई।
28 अगस्त 1968 को पाकिस्तान के कराची में सरवत इकरामुल्लाह और प्रिंस हसन बिन तलाल का विवाह हुआ। यह शादी पाकिस्तानी, जॉर्डनियन और पश्चिमी परंपराओं का अनूठा संगम मानी जाती है। विवाह के बाद वे जॉर्डन की राजधानी अम्मान में बस गईं। इस दंपति के चार बच्चे हैं—तीन बेटियां प्रिंसेस रहमा, प्रिंसेस सुमाया और प्रिंसेस बदिया, जबकि एक बेटा प्रिंस राशिद है।
1968 से 1999 तक, यानी पूरे 31 वर्षों तक प्रिंसेस सरवत एल. हसन जॉर्डन की क्राउन प्रिंसेस रहीं। इस दौरान उन्होंने न केवल शाही जिम्मेदारियां निभाईं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक कल्याण और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। वे जॉर्डन में कई शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं और एक संवेदनशील व प्रभावशाली शाही व्यक्तित्व के रूप में पहचानी गईं।
साल 1999 में जॉर्डन के तत्कालीन राजा किंग हुसैन ने अपने बेटे प्रिंस अब्दुल्ला को देश का नया उत्तराधिकारी घोषित किया, जिसके साथ ही प्रिंस हसन का क्राउन प्रिंस का पद समाप्त हो गया। इसके बाद प्रिंसेस सरवत भी क्राउन प्रिंसेस नहीं रहीं, लेकिन उनका योगदान और विरासत आज भी जॉर्डन के शाही और सामाजिक इतिहास में सम्मान के साथ याद की जाती है।
यह कहानी न केवल भारत और जॉर्डन के ऐतिहासिक संबंधों को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे एक भारतीय मूल की महिला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शाही भूमिका निभाकर इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई।