केजरीवाल की रिक्यूजल अर्जी पर विवाद: सीबीआई ने तथ्यों का खंडन नहीं किया, फिर भी ‘हितों का टकराव’ से इनकार
नई दिल्ली, 16 अप्रैल 2026
तथाकथित शराब नीति मामले में Arvind Kejriwal द्वारा दायर रिक्यूजल अर्जी पर सुनवाई के दौरान एक नया विवाद सामने आया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपने जवाब में केजरीवाल के हलफनामे में उठाए गए प्रमुख तथ्यों का खंडन नहीं किया है, लेकिन इसके बावजूद एजेंसी ने मामले में किसी भी तरह के हितों के टकराव से इनकार किया है।
केजरीवाल द्वारा दाखिल अतिरिक्त हलफनामे में आरोप लगाया गया था कि Swarn Kanta Sharma के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के पैनल में शामिल हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि Tushar Mehta, जो इस मामले में सीबीआई की ओर से पेश हो रहे हैं, वही इन वकीलों को फीस वाले केस आवंटित करते हैं।
हलफनामे के अनुसार, जज के बेटे को 2022 से अब तक 5,500 से अधिक केस मिले हैं, जिसे एक युवा वकील के लिए असाधारण बताया गया है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया कि यह नियुक्तियां और केस आवंटन उसी अवधि में हुए जब जस्टिस शर्मा हाई कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं।
सीबीआई ने अपने जवाब में इन तथ्यों का स्पष्ट रूप से खंडन नहीं किया है। एजेंसी ने यह भी नहीं नकारा कि जज के परिजन सरकारी पैनल में हैं या उन्हें बड़ी संख्या में केस आवंटित हुए हैं। हालांकि, सीबीआई का कहना है कि इन परिस्थितियों से किसी प्रकार का हितों का टकराव स्थापित नहीं होता।
एजेंसी ने यह तर्क भी दिया कि यदि इस तरह की दलीलों को स्वीकार कर लिया जाए, तो उन सभी न्यायाधीशों को मामलों की सुनवाई से अलग करना पड़ेगा जिनके रिश्तेदार सरकार या सार्वजनिक उपक्रमों के पैनल में कार्यरत हैं।
वहीं, आम आदमी पार्टी का कहना है कि यह मुद्दा सामान्य नियुक्तियों का नहीं, बल्कि एक विशिष्ट स्थिति का है, जहां केस में पेश हो रहे वरिष्ठ कानून अधिकारी द्वारा ही न्यायाधीश के निकट संबंधियों को हजारों केस आवंटित किए जा रहे हैं। पार्टी के अनुसार, यह परिस्थिति किसी भी निष्पक्ष पर्यवेक्षक के मन में पक्षपात की आशंका उत्पन्न कर सकती है।
मामले ने न्यायिक निष्पक्षता और संस्थागत पारदर्शिता को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है।