सुभाष चंद्रा के ₹22,006 करोड़ कर्ज मामले में NCLT का बड़ा फैसला, ₹6.5 करोड़ का सेटलमेंट प्लान मंजूर
नई दिल्ली। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के एक फैसले के बाद मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा से जुड़े भारी-भरकम कर्ज मामले ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, करीब ₹22,006 करोड़ के दावों से जुड़े मामले में NCLT ने लगभग ₹6.5 करोड़ के सेटलमेंट प्लान को मंजूरी दे दी है। फैसले के बाद कर्जदाताओं के बीच बेहद बड़े ‘हेयरकट’ को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
LIC Housing Finance को 1,322 करोड़ के दावे के बदले 38.09 लाख
इस मामले में LIC Housing Finance ने प्रस्तावित सेटलमेंट का विरोध किया था। कंपनी का दावा ₹1,322 करोड़ से अधिक बताया गया है। हालांकि मंजूर योजना के तहत उसे करीब ₹38.09 लाख मिलने की बात सामने आई है।
इस आंकड़े के आधार पर भुगतान उसके दावे का बेहद छोटा हिस्सा है। इसी वजह से मामले में कर्जदाताओं के हितों और IBC की प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हो गई है।
80.81% कर्जदाताओं ने दी मंजूरी
NCLT के आदेश के मुताबिक, सेटलमेंट प्लान को करीब 80.81% वोटिंग शेयर वाले कर्जदाताओं का समर्थन मिला। विरोध करने वाले कर्जदाताओं की हिस्सेदारी 20% से कम रही।
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत कर्जदाताओं की ‘कमर्शियल विजडम’ में NCLT आम तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता। उसका मुख्य दायित्व यह देखना है कि समाधान योजना कानूनी प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं।
निजी संपत्ति के मूल्य को भी बनाया गया आधार
मामले में रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया, जिसमें सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्तियों के मूल्य को लगभग ₹6.5 करोड़ से कम बताया गया। इसी आधार पर उपलब्ध संपत्तियों और प्रस्तावित भुगतान क्षमता को भी प्रक्रिया में ध्यान में रखा गया।
विरोध करने वाले कर्जदाता भी योजना से बंधे
NCLT की मंजूरी के बाद स्वीकृत समाधान योजना संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होती है। इसका अर्थ है कि जिन कर्जदाताओं ने योजना के खिलाफ मतदान किया था, वे भी स्वीकृत योजना की शर्तों से बंधे रहेंगे।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कुल दावों और मंजूर सेटलमेंट राशि के बीच बहुत बड़ा अंतर है। हालांकि इसे सामान्य अर्थों में सीधे ‘₹22,006 करोड़ का कर्ज माफ’ कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा; यह दिवालिया/समाधान प्रक्रिया के तहत मंजूर किए गए सेटलमेंट और कर्जदाताओं द्वारा स्वीकार किए गए भुगतान से जुड़ा मामला है।
फैसले ने एक बार फिर IBC प्रक्रिया में कर्जदाताओं की सामूहिक व्यावसायिक समझ, बड़े हेयरकट और छोटे कर्जदारों तथा बड़े कॉरपोरेट मामलों में वसूली व्यवस्था को लेकर बहस को जन्म दे दिया है।