शीर्षक: क्रूरता विवाह की बाउंड्री नहीं देखती: सुप्रीम कोर्ट ने लाइव-इन रिलेशनशिप को भी धारा 498ए का संरक्षण दियामामला: डॉ. लोकेश बी.एच. एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य (2026 INSC 784)
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू क्रूरता का अपराध अब केवल कानूनी रूप से विवाहित महिलाओं तक सीमित नहीं है। अदालत ने कहा कि धारा 498ए आईपीसी (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और 86) उन लाइव-इन रिलेशनशिप्स पर भी लागू होगी, जो “विवाह की प्रकृति” (relationship in the nature of marriage) की हों।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने 3 अगस्त 2026 को दिए गए इस फैसले में कहा—
क्या है यह मामला?
“क्रूरता दरवाजे पर यह नहीं देखती कि वह जिस घर में प्रवेश कर रही है, वह विवाहित महिला का है या नहीं। एक बार प्रवेश करने के बाद उसकी विनाशकारी क्षमता और बढ़ जाती है।”
डॉ. लोकेश बी.एच. पर उनकी कथित साथी श्रीमती तीर्था द्वारा धारा 498ए समेत अन्य धाराओं में मुकदमा चलाया गया था। लोकेश का तर्क था कि उनके बीच वैध विवाह नहीं था, इसलिए धारा 498ए लागू नहीं हो सकती। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को दोहराया कि “पति” शब्द को केवल कानूनी वैध विवाह तक सीमित नहीं रखा जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- केवल वे लाइव-इन रिलेशनशिप्स इस संरक्षण के दायरे में आएंगी, जिनमें विवाह के सभी लक्षण हों—साथ रहना, समाज में पति-पत्नी के रूप में पेश आना, घरेलू और सामाजिक जिम्मेदारियां निभाना तथा विवाह करने का इरादा।
- यह संरक्षण केवल सहमति देने वाले वयस्कों के बीच के संबंधों पर लागू होगा।
- सामान्य रोमांटिक या अल्पकालिक संबंध इस प्रावधान के अंतर्गत नहीं आएंगे।
- महिला को पहले यह साबित करना होगा कि उनका संबंध “विवाह की प्रकृति” का था।
आम लोगों के लिए क्या मतलब है?
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम है। आज के समय में शहरी क्षेत्रों में लाइव-इन रिलेशनशिप आम हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून को समाज की बदलती वास्तविकताओं के अनुकूल होना चाहिए। अगर कोई पुरुष किसी महिला को विश्वास दिलाकर उसके साथ वैवाहिक जीवन जैसा संबंध बनाता है और फिर क्रूरता करता है, तो वह कानूनी वैधता की तकनीकी बातों के पीछे छिप नहीं सकता।अदालत ने याद दिलाया कि धारा 498ए का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू क्रूरता से बचाना है। विवाहित या अविवाहित होने से इस उद्देश्य का कोई सीधा संबंध नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 के तहत महिलाओं को समान सुरक्षा मिलनी चाहिए।
सावधानी भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि धारा 498ए का दुरुपयोग भी हो रहा है। इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया कि यह विस्तार केवल “विवाह की प्रकृति” वाले संबंधों तक सीमित रहेगा और आरोप साबित करने का प्रारंभिक दायित्व महिला पर होगा।सारांश में आम नागरिकों के लिए संदेश:
अगर आप या आपके परिवार की कोई महिला किसी पुरुष के साथ लंबे समय से वैवाहिक जीवन जैसा संबंध रख रही है और उसके साथ क्रूरता हो रही है, तो अब कानूनी सहारा सिर्फ विवाह प्रमाण पत्र पर निर्भर नहीं है। वहीं, पुरुषों को भी समझना चाहिए कि लाइव-इन रिलेशनशिप में भी जिम्मेदारी और कानूनी जवाबदेही दोनों होती है।यह फैसला समाज में महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। कानून अब केवल कागजी रिश्तों तक सीमित नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की क्रूरता को भी पहचानता है।
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