असला लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया में कथित मनमानी और पारदर्शिता की कमी पर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि अब किसी भी आवेदक की फाइल को रिजेक्ट करने पर संबंधित अधिकारी को कारण बताना अनिवार्य होगा। साथ ही अदालत ने संबंधित मामले में तीन महीने के भीतर लाइसेंस जारी करने या उचित निर्णय लेने के आदेश भी दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, जिले में डिप्टी कमिश्नर और डीसीपी (लॉ एंड ऑर्डर) स्तर पर बड़ी संख्या में असला लाइसेंस की फाइलें खारिज किए जाने के आरोप हैं। बताया जा रहा है कि कई मामलों में एसएचओ से लेकर एसपी रैंक तक के अधिकारियों द्वारा लाइसेंस की सिफारिश किए जाने के बावजूद फाइलें अंतिम स्तर पर रिजेक्ट कर दी जाती हैं। गंभीर बात यह है कि आवेदकों को खारिज करने का कारण भी नहीं बताया जाता।
फीस को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि लाइसेंस प्रक्रिया के दौरान आवेदकों से 40 से 45 हजार रुपये तक की राशि वसूली जाती है। पहले जहां लगभग 11 हजार रुपये की फाइल फीस और करीब 29 हजार रुपये सरकारी शुल्क लिया जाता था, वहीं अब कथित तौर पर रेड क्रॉस के नाम पर 15 हजार रुपये की अतिरिक्त पर्ची कटवाई जा रही है, जिसे अवैध बताया जा रहा है।
इसी तरह डीसीपी कार्यालय में भी फाइल प्रोसेसिंग के बाद अलग-अलग सेवा केंद्रों पर करीब 25 हजार रुपये तक फीस ली जाती है। आरोप यह भी है कि भारी फीस वसूलने के बावजूद कई मामलों में फाइलें रिजेक्ट कर दी जाती हैं और आवेदकों को फीस का कोई रिफंड नहीं मिलता।
हाईकोर्ट के इस फैसले को प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अब यह देखना होगा कि जिला प्रशासन इस आदेश को किस तरह लागू करता है और आम लोगों को इससे कितनी राहत मिलती है।