धारा 138 के मामलों में लिमिटेशन का पालन जरूरी, देरी होने पर पर्याप्त कारण बताना होगा; सिर्फ कुछ दिनों की देरी से मामला अपने आप खत्म नहीं होता
आज के समय में पैसों के लेन-देन, व्यापारिक सौदों, कर्ज और अन्य वित्तीय जिम्मेदारियों की अदायगी के लिए चेक का इस्तेमाल आम है। लेकिन यदि बैंक में लगाया गया चेक “इनसफिशिएंट फंड्स” या किसी अन्य कानूनी रूप से मान्य कारण से बाउंस हो जाता है, तो नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज करने के लिए कानून में निर्धारित समय-सीमा का पालन करना बेहद महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया गया है कि यदि धारा 138 के तहत शिकायत निर्धारित अवधि के बाद दायर की जाती है, तो अदालत को पहले देरी माफ करने के आवेदन पर विचार करना होगा। यदि देरी के लिए पर्याप्त और उचित कारण पाया जाता है, तभी देरी माफ करने का आदेश होना चाहिए और उसके बाद ही अदालत शिकायत का कॉग्निजेंस ले सकती है।
मामला क्या था?
मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसने अपने पति सहित एक व्यक्ति को लगभग ₹5.40 लाख की रकम दी थी। बाद में रकम वापस करने के लिए चेक जारी किया गया। बैंक में पेश किए जाने पर यह चेक 17 जुलाई 2013 को “इनसफिशिएंट फंड्स” के कारण बाउंस हो गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजा। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर धारा 138 के तहत शिकायत दायर की गई। हालांकि, शिकायत दाखिल करने में 2 दिन की देरी हो गई थी। मजिस्ट्रेट ने पहले देरी को माफ किए बिना ही शिकायत का कॉग्निजेंस ले लिया। बाद में 30 अक्टूबर 2018 को 2 दिन की देरी माफ कर दी गई। शिकायतकर्ता ने देरी का कारण अपनी बीमारी बताया और मेडिकल प्रमाणपत्र भी पेश किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 142(1)(बी) के प्रावधान पर विचार करते हुए कहा कि यदि शिकायत निर्धारित समय के बाद दाखिल हुई है, तो अदालत को पहले यह देखना होगा कि शिकायतकर्ता ने देरी के लिए पर्याप्त कारण बताया है या नहीं।
यदि अदालत दिए गए कारण से संतुष्ट होती है, तो पहले देरी माफ करने का आदेश होना चाहिए और उसके बाद ही धारा 138 की शिकायत का कॉग्निजेंस लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले कॉग्निजेंस लेना और बाद में देरी को माफ करना सामान्य प्रक्रिया के तौर पर एक-दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
सिर्फ 2 दिन की देरी भी महत्वपूर्ण
इस फैसले से यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि देरी कम होने से कानूनी समय-सीमा की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती। यदि शिकायत लिमिटेशन की अवधि के बाद दाखिल हुई है, तो धारा 142(1)(बी) के प्रावधान के अनुसार पर्याप्त कारण बताना आवश्यक है।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि देरी से दाखिल हर चेक बाउंस केस अपने आप समाप्त हो जाएगा। यदि शिकायतकर्ता उचित और पर्याप्त कारण साबित कर देता है, तो अदालत कानून के अनुसार देरी माफ कर सकती है।
चेक प्राप्त करने वाले के लिए जरूरी सावधानियां
चेक बाउंस होने के बाद बैंक रिटर्न मेमो, कानूनी नोटिस, डाक या कूरियर की रसीद, डिलीवरी अथवा अनक्लेम्ड स्टेटस और शिकायत दाखिल करने की तारीख जैसे सभी दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। नोटिस और शिकायत की समय-सीमा की सही गणना करना जरूरी है।
चेक जारी करने वाले व्यक्ति को भी अदालत के रिकॉर्ड के आधार पर यह जांच करनी चाहिए कि शिकायत कब दाखिल हुई, कॉज ऑफ एक्शन कब पैदा हुआ, शिकायत समय पर थी या नहीं, देरी होने पर कंडोनेशन आवेदन दिया गया या नहीं और देरी माफ करने का आदेश कॉग्निजेंस से पहले हुआ या बाद में।
सबसे बड़ी कानूनी सीख
चेक बाउंस मामलों में लिमिटेशन को हल्के में नहीं लेना चाहिए। यदि शिकायत निर्धारित अवधि के बाद दाखिल हुई है तो पहले देरी का कारण और उसकी माफी, उसके बाद कॉग्निजेंस और फिर मामले की आगे की कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए।
मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट द्वारा देरी माफ करने से पहले लिए गए कॉग्निजेंस को गलत प्रक्रिया माना और अंततः संबंधित शिकायत को क्वैश कर दिया।