100 के करीब डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों पर कार्रवाई अधर में, 3 महीने बाद भी FIR का इंतजार
जालंधर: नगर निगम जालंधर की करोड़ों रुपये की बकाया राशि दबाकर बैठे करीब 100 डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों के खिलाफ कार्रवाई का मामला लगातार लटका हुआ है। निगम द्वारा पुलिस कमिश्नर को एफ.आई.आर. दर्ज करने के लिए पत्र भेजे हुए लगभग तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक इस मामले में कोई ठोस पुलिस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे नगर निगम की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
नगर निगम ने करीब तीन महीने पहले डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों की सूची तैयार कर पुलिस को भेजी थी और स्पष्ट किया था कि संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा पंजाब अपार्टमेंट एंड प्रॉपर्टी रेगुलेशन एक्ट (PAPRA) के तहत आपराधिक मामले दर्ज करवाए जाएंगे। इसके अलावा डिप्टी कमिश्नर को भी पत्र लिखकर इन कॉलोनाइजरों के नाम पर मौजूद खाली प्लॉटों की रजिस्ट्रियों और अन्य संपत्ति लेन-देन पर रोक लगाने की सिफारिश की गई थी।
हालांकि, तीन महीने बीत जाने के बावजूद मामला फाइलों तक ही सीमित दिखाई दे रहा है। न तो एफ.आई.आर. दर्ज होने की कोई जानकारी सामने आई है और न ही प्रस्तावित प्रतिबंधों को लेकर कोई स्पष्ट कार्रवाई दिखाई दी है।
इस पूरे मामले में सबसे अहम पहलू यह है कि मेयर वनीत धीर लगातार पिछले करीब डेढ़ वर्ष से निगम की बकाया राशि की वसूली के लिए प्रयासरत हैं। उनका कहना रहा है कि डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों से करोड़ों रुपये की बकाया राशि वसूल कर शहर के विकास कार्यों को गति दी जा सकती है। इसके बावजूद संबंधित विभागों की ओर से अपेक्षित गंभीरता नजर नहीं आ रही।
सूत्रों के अनुसार अधिकारियों को कई बार बकाया राशि की वसूली और कानूनी कार्रवाई तेज करने के निर्देश दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रगति बेहद धीमी रही। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नगर निगम वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है और विकास परियोजनाओं के लिए धन की आवश्यकता है, तो करोड़ों रुपये की बकाया राशि की वसूली को लेकर प्रशासनिक ढिलाई क्यों बरती जा रही है।
शहरवासियों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि नगर निगम और पुलिस प्रशासन डिफॉल्टर कॉलोनाइजरों के खिलाफ कब तक प्रभावी कार्रवाई करते हैं और निगम के खजाने में बकाया राशि की वसूली कब तक सुनिश्चित होती है।